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Digital clock

Wednesday, 27 June 2012

समय

नहीं रुका है, नहीं रुकेगा,
सबको रोक बढ़ते रहा है
द्रोण, भीष्म, सिकंदर आया
सबको छोड़ अजेय रहा है.

सूर्य चन्द्र हो या तारे
उदय-अस्त के ये मारे,
इसके आगे नभ है हारा
अवनी  भी नहीं टिक पाई

गिरिराज हिमालय कतराता है
सागर भी भय खाता है,
नदी नाले थर्राते हैं,
समय सदा बढ़ जाता है.

चंद क्षणों का जीवन है,
यदि जीवन में कुछ करना है,
संग समय के चलना सीखो,
यदि आगे कुछ पाना है.

कमान से निकला तीर समय,
जबान से निकली वाणी समय,
मरू से निकली नीर समय,
पीछे नहीं देखता समय.

अजर अमर है समय सदा से,
फिर भी बढ़ते रहता है,
तुम मेहमान चाँद क्षणों के,
क्यों कर पीछे रहते हो,

कद्र करोगे तुम समय का
समय तुम्हारी कद्र करेगा,
समय से घबरा जाओगे
जीवन भर पछताओगे.

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Tuesday, 27 March 2012

अजब तमाशा प्रकृति का

कितना सुंदर
कितना प्यारा
इस जगती का
रूप है न्यारा...
तोता बोले
हरियाली घोले
लाल चोंच में
सुर्खी डोले.

गौरैया का जोड़ा देखो
कैसे रखवाली करे
नीड  की.
कभी पंख समेटे
उड़े जहाज सी
कभी खीज दिखाए.

कबूतर गुटर-गू, गुटर गू
में लगा.
ख़त पैगाम ले
जाने की आस में जुटा
छत की मुंडेर में बैठा
अंडे की रखवाली करता

कौवा रावन
उड़ा चला आया
झपटा मारा नीड़ बिखेरा
कबूतर के पंख उखाड़ा
लहू लुहान किया
जब उसको
तब जाकर अंडे खा पाया.

अजब गजब प्रकृति का रूप
कौन नहीं?
जो इससे है दूर...
आँखें देख थकी नहीं
खोया सब संसार.

जगती की विकट माया में
भूला मैं घर बार
नाचे ताक धिना धिन धीन
ईश का है
रचना संसार.

गिलहरी भी सरपट भागे
धमाचौकड़ी में है आगे
सबको वह चौकाए
छकाये धूम मचाये
अपने में मशगूल
झरनों का शोर गुल
पहाड़ों का श्याम रूप
हरियाली की सुन्दरता
हवा की नमी
आँखों की ठंडकता
क्या रही खूब
जो देखा मैंने रूप.
जो देखा मैंने रूप.

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Saturday, 24 September 2011

बिम्ब

रेखांकन: ललित मिश्रा 
हर पल खुशियाँ बिखराने को 
दिल की आभा काफी है 
अमृत मुखरित बिम्ब है उसमें
वहाँ पवित्रता की वाणी है...

तेज प्रताप रश्मि जहां है
मानवता का संचार वहाँ है
अखिल विश्व  की संजीवनी 
स्वार्थों का संहार वहाँ  है...

आधार शीला बस एक यही है 
यही है ज्ञान चक्षु मेरी 
मेरी दिव्य पताका यही है 
यही ज़िंदगी मेरी है...

भूत भविष्य यही है 
नित धर्म कर्म यह मेरी है 
उसकी हर क्रंदन में मैं हूँ 
मेरी छोटी सी दुनिया यही है. 

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